Showing posts with label Politics and Nishad. Show all posts
Showing posts with label Politics and Nishad. Show all posts

निषाद सभाओँ का कड़वा सच



दोस्तोँ क्या आप जानते हैँ
निषाद सभा मेँ बुद्विजीवियोँ को
बोलने के लिए कितना समय
मिलता है ?


मै 25 से ज्यादा बार
निषाद सभाओँ मेँ गया हूँ

इस आधार पर मैँ
कहता हूँ

निषाद सभा मेँ बुद्विजीवियोँ को
बोलने के लिए समय
मिलता है


केवल 2 मिनट


बुद्विजीवी माने क्या ??
बुद्विजीवी से मेरा मतलब
है निषाद समाज के वे लोग
जो सरकार द्वारा आयोजित
कम से कम 5 अलग अलग
प्रतियोगी परीक्षा मेँ बैठ चुके होँ
और किसी एक परीक्षा मेँ
उन्हेँ सफलता मिली हो



निषाद समाज के इन बुद्विजीवियोँ
के पास निषादोँ को देने
के लिए कुछ बुद्वि और
सुझाव है


ये वे लोग हैँ जो
चक्रव्यूह के सातोँ द्वारोँ
को तोड़ना जानते हैँ



आखिर क्या चाहते हैँ बुद्विजीवी ???
15000 वेतन पाने वाले
और 10 से 5 आफिस मेँ
डयूटी करने वाले
बुद्विजीवी मात्र इतना चाहते हैँ
कि जब भी कहीँ निषाद सभा
या सम्मेलन हो
तो मँच पर बुला कर
1 घंटा उन्हेँ भी बोलने
दिया जाय


पर दोस्तोँ असलियत क्या है ????

आप खुद किसी निषाद
सभा मेँ जाकर देख
सकते हैँ
इन्हेँ मंच तक पहुँचने
ही नहीँ दिया जाता

और अगर कुछ बुद्विजीवियोँ
को मौका भी मिलता है
तो 2 मिनट का


2 मिनट मेँ 120 सेकेण्ड
होते हैँ

10 सेकेण्ड मंच तक पहुचने
मेँ लगते हैँ

10 सेकेण्ड मंच से वापस
उतरने मेँ लगते हैँ

शेष बचा समय = 100 सेकेण्ड


15000 वेतन पाने वाले
और 10 से 5 आफिस मेँ
डयूटी करने वाले
बुद्विजीवी
को केवल 100 सेकेण्ड
मेँ बतानी होती है
कि आखिर निषाद समाज
क्यूँ पिछड़ा है
कैसे और कब से हो रहा है
उनके साथ अन्याय
और सबसे जरूरी बात
क्या है उपाय ???


पर घबराइए मत दोस्तोँ
अब हम मुन्नाभाई जैसे
चुटकुलोँ पर काम कर
रहे है
जिन्हेँ सुनाने मेँ
100 सेकेण्ड से कम
का वक्त लगता है


2 मिनट बाद निषाद
जाति के कार्यकर्ता
चिल्लाने लगते है :
"अबे साले मंच से
उतरेगा की नहीँ,
टाइम खत्म, नेता लोग
का अब नाच गाना सुनने
का मन है
अब नाच गाना होगा "

मंच सजने लगता है
बुद्वजीवी कहता है
"भाई जब तक मंच
सज रहा है मुझे कुछ
बोलने दो "

निषाद
जाति के कार्यकर्ता :
"माधरचोद तेरे को नेताजी
ने भाषण सुनने को बुलाया है
या भाषण देने के लिए"


15000 वेतन पाने वाले
और 10 से 5 आफिस मेँ
डयूटी करने वाला
बुद्विजीवी
मंच से उतर जाता है


फिर मंच पर आते हैँ
कव्वाल
पहले दारू की बोतल
खोल कर दारू पीयेगेँ
फिर गाना चालू होगा

"का होई निरहू
पढाई ये बचवा
लेता 2 ठे बकरी
जिआई ए बचवा"


नेता को पूरी छूट
चाहे 5 घंटे के सम्मेलन
मेँ 3 घंटा भाषण देता रहे

भाषण चालू होता है
एक ठे रहेन राम जी
जब जंगले मेँ गएन
तो मिले निषादराज
बोलो जय निषादराज
एक ठे रहेन एकल्वय
बोलो जय एकल्वय

मायावती ने हमको
केवल पाँच टिकट दिया
सारे समाज का वोट
मायावती को जाना
चाहिए

मुलायम के समर्थक नेता
जब मंच पर आते हैँ
तो

मुलायम ने हमको
केवल छ: टिकट दिया एक ज्यादा दिया
सारे समाज का वोट
मुलायम को जाना
चाहिए


15000 वेतन पाने वाले
और 10 से 5 आफिस मेँ
डयूटी करने वाले
बुद्विजीवी
किसी कोने मेँ बैठा
रो रहा है
आखिर रविवार
की छुट्टी थी
घर पर रह कर आराम करता


अगली सभा मेँ उसे देखते
ही निषाद जाति के नेता
इस आदमी को पहले
घसीट कर सभा से बाहर करो


आखिर मंच पर
बुद्विजीवियोँ को
क्यूँ नहीँ बोलने देते
निषाद जाति के नेता :
कारण है डर
निषाद जाति के नेता
सोचते हैँ अगर बुद्वीजीवियोँ को
मंच से बोलने देगेँ तो
15000 वेतन पाने वाले
और 10 से 5 आफिस मेँ
डयूटी करने वाले
बुद्विजीवी
अपनी अपनी नौकरियाँ
छोड़ कर चुनाव
लड़ना चालू कर देगेँ
और फिर तब उनको
समाज मेँ कोई नहीँ पूछेगा
उनका राजनीतिक कैरियर
तबाह बरबाद हो जाएगा

दोस्तोँ इस लेख को
निषाद समाज के हर
नेता को पढकर सुनाओ
ताकि जब 5 घंटे
की सभा मेँ
3 घंटा उन्हेँ बोलने
को मिले

उन्हेँ कोई पद नहीँ चाहिए
बस इतनी सी विनती
बुद्विजीवियोँ के समय
का दायरा 100 सेकेण्ड से
कुछ बढ़ा दिया जाए

written by Amit Nishad

जनलोकपाल और निषाद

कभी सोचा है कि अगर
अन्ना का जनलोकपाल कानून 
बन जाए तो निषाद 
समाज को क्या फायदा 
होगा ?


मैँ कहता हूँ कुछ नहीँ


जी हाँ कुछ नहीँ


भष्ट्राचार मिट जाएगा तो 
जाति प्रमाण पत्र
राशन कार्ड
पासपोर्ट
सब आसानी से बन जाएगा


पर जब 1000 IAS अधिकारियोँ की भर्ती होगी तो आबादी के हिसाब से न्यूनतम 200 अधिकारी निषाद समाज से नहीँ जा पाएगेँ

अन्ना के जनलोकपाल कानून 
बनने के बाद भी
निषाद समाज के 
महज 2 या 3 ही लोग
ही IAS बन पाएगे 


जब डिग्री कालेजोँ मेँ 1000
शिक्षकोँ की भर्ती होगी तो आबादी के हिसाब से न्यूनतम 200 शिक्षक निषाद समाज से नहीँ जा पाएगेँ

अन्ना के जनलोकपाल कानून 
बनने के बाद भी
निषाद समाज के 
महज 1 या 2 ही लोग
ही डिग्री कालेज मेँ
शिक्षक बन पाएगे


पता कीजिए आपके 
कालेज मेँ कुल कितने 
शिक्षक है
क्या 24.3 प्रतिशत शिक्षक
निषाद समाज के हैँ ?


इसके लिए हमेँ भगत सिँह राजगुरू चंद्रशेखर आजाद आदि का समाजवाद लाना होगा


via Amit Nishad

14.5 प्रतिशत नौकरियाँ निषादोँ को मिलनी चाहिए

उत्तर प्रदेश मेँ निषाद 
समाज की वास्तविक 
आबादी पैँतालिस प्रतिशत (45 PERCENT) है


उत्तरप्रदेश का कोई
ऐसा गाँव शहर मोहल्ला नहीँ जहाँ
निषाद समाज के लोग नहीँ रहते


जब आरक्षण देने के 
लिए जाति आधारित
जनगणना की गई तो
निषाद समाज की आबादी का 
कुल प्रतिशत लगभग 40 आया 


उच्च जातियोँ को लगा
कि अगर समाजवाद
के नियमोँ के मुताबिक
अगर इन्हेँ आरक्षण देना पड़ा
तो 40 प्रतिशत का आरक्षण देना पड़ेगा


इसे रोकने के लिए उच्च जातियोँ 
के पास केवल रास्ता था
ठाकुर ब्राह्मण पंडित
आदि 
उच्च जातियोँ की आबादी
सरकारी आकड़ोँ मेँ
बढ़ा कर
बताया जाय और
निषाद व अन्य जातियोँ
की आबादी जितना 
ज्यादा घटा सकेँ 
उतना ज्यादा घटा
दिया जाए


सारी तिकड़म करने के बाद भी
सरकार सरकारी आकड़ोँ 
मेँ हमारी जाति की 
आबादी 40 प्रतिशत
से
घटकर
22 प्रतिशत हो गई


पर ये निषाद समाज को
22 प्रतिशत भी नहीँ
देना चाहते थे

उन्होने निषाद समाज
की 
7.5 प्रतिशत उपजातियोँ
को घुमन्तु घोषित कर
दिया


जी हाँ

घुमन्तु

यानी एक जगह से
दूसरी जगह घूमने
वाले


और जो एक जगह से
दूसरी जगह घूमने
वाले हैँ जिनका कोई 
निश्चित ठिकाना
नहीँ था
उनका जाति प्रमाण
पत्र नहीँ बनाया जा
सकता


उन्हेँ किसी भी प्रकार का
आरक्षण आज तक
प्राप्त नहीँ है 


निषाद समाज को अलग
से 14.5 प्रतिशत ना देकर
अन्य पिछड़ा वर्ग मेँ
रख दिया गया

और जो 14.5 प्रतिशत
नौकरियाँ
निषादोँ को मिलनी
चाहिए थी
उसमेँ से केवल 0.5
प्रतिशत ही मिल पाता है

बाकी कि 14 नौकरियोँ
पर यादव जाति के
युवकोँ का कब्जा 
हो जाता है


घुमन्तु आरक्षण
मागने तो जाए मार
कर भगा दिया जाएगा
"सालोँ घुमन्तु की जाति
घुमोँ फिरो ऐश करो

नौकरियोँ आदि मेँ हिस्सा
मागोगे तो जमीन मेँ 
दफन कर दिए जाओगे "

अगर आप ब्लाग
लिखते है तो अपने 
ब्लाग पर इसे पोस्ट करेँ

अगर आप नेता हैँ
तो अपने गाँव के
लोगोँ को बताए
via Amit Nishad

समाजवाद क्या है ?

समाजवाद क्या है ?

समाज मेँ सभी जातियोँ और वर्गोँ का सरकारी तंत्र मेँ उनकी आबादी के अनुसार उचित प्रतिनिधित्व

ये परिभाषा समाजवाद के पिता कार्ल माकर्स की है l ऐसी ही परिभाषा हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के क्रांतिकारी भगत सिँह ने भी दी है

उत्तर प्रदेश मेँ निषाद समाज की सभी उपजातियोँ की आबादी इतनी है कि 404 विधान सभा की सीट मेँ से न्यूनतम 80 निषाद समाज की सभी उपजातियोँ से चुनी जानी चाहिए

खुद को समाजवाद के मुताबिक बताने वाली समाजवादी पार्टी ने क्या निषाद समाज के 80 उम्मीदवारोँ को टिकट दिए हैँ 

अगर नहीँ तो हटा दो ये समाजवादी शब्द पार्टी के नाम से

सपा का नया नाम = जातिवादी पार्टी

बसपा का नया नाम = बपा बहुजन पार्टी

आइए आने वाली 26 जनवरी को संकल्प ले की समाजवाद के नाम पर अन्याय पूर्ण व्यवस्था को नहीँ सहेगेँ
जिस समाजवाद के लिए भगत सिँह आजाद जैसे लोगोँ ने जान दी वो आकर रहेगा



दोस्तोँ जिस दिन गाँव 
गाँव मेँ निषाद समाज
ने एक एक जिन्दा 
बच्चे औरत आदमी 
को जाति को गिन कर
गुपचुप तरीके से
"जाति रजिस्टर" बना लेगी
और फिर सारे आकड़ोँ को जोड़ेगी

उसे पता चलेगा कि
उत्तरप्रदेश मेँ 60 प्रतिशत 
निषाद समाज के लोग हैँ


निषाद समूह के कुछ बुद्विजीवी 
लोगोँ का अनुमान कहता है
उत्तरप्रदेश मेँ 
चाहे जैसे जोड़ो 
न्यूनतम 45 प्रतिशत 
निषाद समाज है

जरा सोचो तब क्या
होगा जब निषाद समाज को
पता चलेगा कि
उत्तरप्रदेश मेँ 60 प्रतिशत 
निषाद समाज के लोग हैँ


अगर विधानसभा की 
60 प्रतिशत सीटेँ
निषाद समाज को दे 
दी जाए

केवल आधी सीटेँ चाहिए सरकार बनाने के लिए


आने वाले 1000 सालो
तक निषाद उत्तरप्रदेश पर राज्य करेँगेँ


आने वाले 1000 सालो
तक उत्तरप्रदेश का हर
मुख्यमंत्री निषाद होगा
हर मंत्री निषाद होगा

हर मंत्रालय के प्रमुख 
की कुर्सी पर निषाद 
बैठा होगा


पर कैसे होगा ये सब
आजादी मिले 65 साल 
हो गए और हमारी जाति
के नेता एक जाति 
रजिस्टर नहीँ बना पाए


अपने गाँव के नेता एक 15 रूपए
की रजिस्टर नोटबुक



क्या आप अपने नेता 
को एक 15 रूपए की 
कापी खरीद कर नहीँ दे सकते ?


निषाद समाज के नेता 
से कहो
लिस्ट बनाए उन सब की जो आगामी मतदान मेँ वोट
देने वाले हैँ

देखना तुम्हारे गाँव मेँ 
हर कोई वोट देने जाएगा

ठाकुर पंडित यादव 
बम्बई दिल्ली गए 
अपने रिश्तेदारोँ को 
भी आने जाने का टिकट और पाँच सौ 
रूपए भेज कर बुला 
लेते हैँ

मतदाता सूची लेकर बैठो
एक एक चेहरे के बारे
मेँ पता लगाओ
वो गाँव मेँ किसके घर 
का है और कहाँ रहता है

अपने दादा जी से पूछो
क्या ये ठाकुर
आपके गाँव मेँ पैदा हुआ था

ध्यान से देखो

सनसनीखेज खुलासे होगेँ

अपने आप को उत्तरप्रदेश मेँ
50 प्रतिशत
बताने के लिए 
इन्होने अपने परिवार
के सदस्योँ की संख्या 
बढा कर लिखाई है

हमारे गाँव मेँ अजय सिँह
के दो बेटे हैँ
मतदाता सूची मेँ इनके
18 बेटे और बेटियोँ के
नाम दर्ज हैँ

दोस्तोँ क्या 50 प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण नहीँ मिलना चाहिए


नहीँ बिल्कुल गलत बात


हर जाति को उसकी आबादी के हिस्सा से
हिस्सा मिलना चाहिए


अगर किसी राज्य मेँ ठाकुर ब्राह्मण की आबादी केवल 2 प्रतिशत है तो उस राज्य मेँ ठाकुर ब्राह्मणोँ को 2 प्रतिशत से ज्यादा सीटेँ नहीँ लेनी चाहिए

आबादी केवल 2 प्रतिशत
फिर भी ठाकुर ब्राह्मण चाहते है कि 50 प्रतिशत सीटेँ सामान्य वर्ग अर्थात ठाकुर लाला ब्राह्मण से भरी जाएँ


क्या ये शहीद भगत सिँह राजगुरू आजाद के समाजवाद के सपने को चकनाचुर करना नहीँ है

क्या ये देश के साथ द्रोह नहीँ कर रही

निषादो को छलती कांग्रेस

कांग्रेस २००३ से मछुआ समुदाय को छलती चली आ रही है| १६ पिछड़ी जातियों को अनुसूचित
जातियों का दर्ज़ा देने सम्बन्धी प्रस्ताव को कांग्रेस ही लटकाए बैठी रही| जब कि मुलायम
सिंह जी की सरकार में उक्त प्रस्ताव चार दफे केंद्र को संस्तुति सहित भेजा गया| मायावती जी ने तो हद
ही कर दी, सरकार बनाने के २२ दिनों के भीतर मूल प्रस्ताव वापस मंगाकर निरस्त
करवा दिया, जैसे बहन जी इसी मुद्दे पर जीत कर आयीं हों| जब समाज ने दबाब बनाया तो महज २
पन्नो की चिठ्ठी केंद्र को भेजकर बसपा ने पिंड छुढ़ा लिया और गेंद फिर से केंद्र के पाले में डाल दी|
हमें फ़ुटबाल समझ कर इन लोगों ने अपने गोल मारे और जीतने पर अपनी फ़तेह
का जश्न मनाने चले गए, हमारी खाली गेंदे मैदान में अपनी तकदीर बदलने वाले मसीहा की अब तलक
मुन्तजिर रही हैं| अब कांग्रेस फिर से धोखा देने की तैयारी में है |दर असल कांग्रेस हमेशा से ही नज़र अंदाज़
करने की सियासत करती चली आई है| नेहरु के सामने जिन्ना को नज़र  अंदाज़ किया, सरदार
पटेल के सामने बाबा साहब डाo आंबेडकर को नज़र अंदाज़ किया, लोहिया को नज़र अंदाज़ किया,
इतना ही नहीं मुसलमानों को तो हमेशा से ही नज़र अंदाज़ किया और आज भी कर रही है|
वर्ना कोई वाजिब वज़ह नहीं है जो सच्चर कमिटी व रंग नाथ मिश्र कमिटी कांग्रेस को दोष
देती| आज बहुसंख्यक दलितों के सामने अल्पसंख्यक दलितों को उपेक्षित किया जा रहा है|
मीरा कुमार और सुशील शिंदे जैसे नेताओं के दबाब में मछुआ आरक्षण आज भी लंबित है| यदि कांग्रेस
के नेताओं में ज़रा भी शर्मोहया बाक़ी है तो केंद्र सरकार भारत रत्न स्वर्गीय श्री राजीव गांधी के
मछुआ समाज को अनुसूचित जाति का दर्ज़ा दिलाने सम्बन्धी ख्वाब को जल्द से जल्द पूरा करे| कांग्रेस
की नीति और नियत उसी दिन जगज़ाहिर हो गयी थी, जब आरक्षण की आवाज़ उठाने का अंजाम कई निषाद
नेताओं ने कांग्रेस से अपने निष्कासन के रूप में झेला था| मछुआरा समुदाय अब कांग्रेस और बसपा के
बहकावे में आनेवाला कतई नहीं है और अपने १०% वोट का सही वक़्त पर सही इस्तेमाल करेगा एवं
अपने मछुआ समुदाय के हित की बात करने वाले को पहचानने में ज़रा भी भूल नहीं करेगा|
writen by - Vishambhar Prasad Nishad

निषाद भाइयो एक हो जाओ फिर सत्ता तुम्हारे हाथ मे।

बिखरी हुई
ताक़त "
हम लोग शिकवा- शिकायतें
ही करते रह गए और दूसरे
अपना काम निकलवा कर ले
गए| हम
साधनों की कमी का ही रोना
रहे और दूसरे सत्ता व शासन में
अपनी पकड़ बनाते चले गए|
उन्होंने अपनी जातीय
पहचान को बढाया और संगठन
बना कर अपने वोटों को एक
जुट करके राजनैतिक
शक्ति हासिल करते हुए
सरकार का हिस्सा बन बैठे,
जब कि हम न तो साधनों में
पीछे थे, न संख्याबल में | न
अनुभवहीन ही थे और न
ही मृतप्राय, फिर भी हमें
कोई राजनैतिक दल गिनने
को तैयार नहीं, शक्ति के रूप
में जानना और हमसे
डरना तो दूर
की कौड़ी रही| कारण स्पष्ट
हैं- बिखरी हुई ताक़त,
लुप्तप्राय् मान- सम्मान और
राजनैतिक इच्छाशक्ति
का घोर अभाव| इसलिए
बिखरे और बँटे हुए लोगों से
किसे और कैसा भय?
अपनी आबादी पर यदि हम
गौर करें
तो पश्चिमी उत्तरप्रदेश
की करीब ९०
विधानसभा सीटों पर
हमारा वोट है| प्रत्येक सीट
पर कम से कम दस हज़ार से
लेकर एक लाख तक
तुरैहा मछुआरा वोट है| मध्य
यूपी में अन्य
मछुआरा उपजातियों की बदौल
हम ४० सीटों पर, पूर्वांचल
की ८० सीटों पर , बुंदेलखंड
की मछुआ व् नाविक
जातियां ४० सीटों पर एवं
ब्रजक्षेत्र की ५० सीटों पर
मछुआ समाज अपने अन्य
सजातीय वोटों की ताक़त पर
निर्णायक की भूमिका में है|
इस तरह पूरे उत्तरप्रदेश
की ३००
विधानसभा क्षेत्रों में
हमारी हैसियत महत्वपूर्ण है|
यह आंकड़ा सरकार बनाने और
गिराने के लिए पर्याप्त है|
इस संख्याबल से हमारा समाज
भारी उलटफेर कर सकता है|
या कम से कम
इतना तो किया ही जा सकता
कि जो दल हमारी मांगों/
अनुसूचित जातियों के आरक्षण
पर विचार न करे, उसे हरा दें,
हटा दें |
लेकिन ये आंकड़ा सिर्फ
कागज़ी ही है, हकीकत से
कोसों दूर | एक नेता और एक
नियत के अभाव में हमारे
सभी प्रयास अँधेरे में तीर
चलाने जैसे हैं|७ जातियों और
४३ उपजातियों में बँटा यह
समाज अपना एक सर्वमान्य
संगठन तक
नहीं बना पाया है, एक
नेतृत्व की तो बात ही छोड़
दीजिये| अब नेतृत्व के अभाव
में कैसे संघर्ष किया जाए, किन
मुद्दों को उठाया जाए और
किस प्रकार अपनी बात
सरकार में बैठे संवेदनहीन और
सरोकार से दूर रहने वाले
लोगों तक पहुंचाई जाए, ये
बड़ा विचारणीय प्रश्न है | ये
ज्वलंत बिंदु हैं, ये पहेलियाँ हैं
और मुंहबांये खड़े सवाल हैं
समाज के नौजवानों के लिए,
और चुनौतियाँ हैं समाज के हर
उस व्यक्ति के लिए,
जो अपनी जाति से
ज़रा सा भी लगाव रखता है|
अपनी बिखरी ताक़त
को सहेजना होगा|
अपना सोया स्वाभिमान
जगाना होगा| अपनी बात के
लिए मरना सीखना होगा|
अपने विकास के लिए
दूसरों का मुंह ताकना बंद
करना होगा| अपने संगठन से
अपनी ताक़त खुद
बनानी होगी| इसके लिए
अपने मतभेद भुलाने होंगे|
आपसी वैमनस्य को भूलकर
भाईचारे
की भावना को विकसित
करना होगा| अपने तुच्छ
स्वार्थों के लिए समाज
की एकता को दांव पर लगाने
वाले जयचंदों की शिनाख्त कर
उन्हें समाज से
धकियाना होगा| समाज
का हित सोचने वालों को ढूंढ
ढूंढ कर आगे लाना होगा,
निश्चय ही ये
ही वो भागीरथ होंगे,
जो समाज में
क्रान्ति की गंगा ले आयेंगे |
इसके लिए हमें इंतज़ार नहीं,
शुरुआत
करना होगी क्योंकि २०१२
अब ज्यादा दूर नहीं है|
"वो मुतमईन है , पत्थर पिघल
नहीं सकता |
मैं बेक़रार हूँ , आवाज़ में असर के
लिए || writen by vishambhar prashad nishad

मल्लाहो के रोटी छीनती बसपा सरकार। बालु खनन पर दबंगो का राज।

‘इलाहाबाद के शंकरगढ़, जसरा,
बरगढ़ और घूरपुर मिर्जापुर के चुनार, अदलपुरा, गांगपुर वाराणसी के तातेपुर, टीकरी तथा लखनउ,जौनपुर,चंदौली, भदोही बालू
खनन माफियाओ राज है। बालु खनन तथा नदी मे आरपार कराने का अधिकार सिर्फ मल्लाहो का है परन्तु बसपा सरकार के आते ही दबंगो तथा उच्च बिरादरी के लोगो को बालु खनन का ठेका अधिकारीक तौर पर दिया जा रहा है। सरकार उच्च जाती के लोगो को ठेका देकर मल्लाहो की रोटी छीन रही है। खबर के विश्लेषण पर आने से पहले
इस क्षेत्र के आर्थिक राजनीतिक
समीकरण को जान लेना जरूरी है। घूरपुर,
शंकरगढ़, जसरा और बरगढ़ ब्लाक
यमुना नदी के तटवर्ती क्षेत्र हैं,
जहां एक ओर भुखमरी के कगार पर निषाद मल्लाह जाति के लोग हैं,
जिनके जीवन का आर्थिक आधार नदी, बालू
और नदी किनारे खेती है
तो वहीं दूसरी ओर यह पूरा क्षेत्र
बालू और पत्थर के अवैध खनन के लिए
भी मुफीद है। जिस पर मौजूदा समय में
बसपा के सांसद कपिल
मुनि करवरिया का एकक्षत्र राज है।
करवरिया जी अखिल भारतीय ब्राह्मण
महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं
तथा बसपा में आने से पहले भाजपा में
थे और इन्हें ही इस क्षेत्र में
बजरंग दल खड़ा करने का श्रेय
भी जाता है। वहीं इनके एक भाई
भाजपा से अभी-अभी विधायक हुए हैं।
करवरिया के अवैध बालू खनन,
जिसका सलाना टर्न ओवर करोड़ों का है,
के खिलाफ वहां के मल्लाह
जाति के लोग लंबे समय से कम्युनिस्ट
पार्टियों के नेतृत्व में आंदोलनरत
हैं। जिस पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने
भी तल्ख टिप्पणी करते हुए माफिया के
खिलाफ कार्रवाई और अवैध रूप से चल
रही बालू मशीनों को तत्काल बंद करने
का आदेश दिया था। न्यायालय में
अपनी हार और सड़क पर गरीब -
गुरबों का कम्युनिस्ट पार्टियों के
नेतृत्व में बढ़ती जन गोलबंदी से
निपटने का रास्ता उन्होंने इस पूरे
आंदोलन को नक्सलवाद के हव्वे से
जोड़ने में निकाला , जिसमें
मीडिया का एक हिस्सा उनका सबसे
विश्वसनीय सहयोगी बनकर उभरा है। आज
स्थिति इतनी हास्यास्पद हो चुकी है
कि भाकपा माले के जनसंगठनों के
नेतृत्व में चल रही है।

मल्लाहो को अगर अपने अधिकार लेने है तो उन्हे एकजुट होना होगा । निषाद लोग एकता दिखाये तभी उनका आर्थिक,समाजीक व राजनितीक स्थिती अच्छी हो सकती है। हमारी जाती के लोगो की स्थिती अती दयनिय है जिसे बदलना है। आप सभी निषाद बन्धु ध्यान दे हम अपने हक के लिये आन्दोलन करेन्गे हमे अपना अधिकार लेना हैँ।

जै निषाद!

N.A.F. The leader of fishermen

याचना नहीँ अब रण होगा,
जीवन या मरण होगा,
संघर्ष बड़ा भीषण होगा।
जिल्लत और अन्याय का जीवन अब हमको न जीना है,
जीन आखो मे आसु है चिँगारी उसमे भरना है।

दलित मुख्यमंत्री के राज में निषाद दुःखी क्यों?

दलित मुख्यमंत्री के राज में निषाद दुःखी क्यों?


भगवान राम को सरयू पार कराने वाले निषाद राज केवट ने राम राज में तो सुख भोगा पर यह कभी नहीं सोचा होगा कि कलियुग में जब दलितों का राज आयेगा, तो निषादों की संतानों पर अत्याचार होंगे और उनसे उनके जीने के साधन छीन लिये जायेंगे। प्रयागराज इलाहाबाद में यमुना, गंगा व सरस्वती का मिलन स्थल है। यहां लगभग ३०० किमी यमुना का कछार बहुत ब़ढया यमुना रेत से पटा प़डा है। जिसे खोद कर बेचने का पारंपरिक कानूनी हक स्थानीय समुदाय को होता है, जो इस इलाके में निषाद है। पर स्थानीय खनन माफिया के चलते आज यह निशाद समुदाय दरदर की ठोकरे खा रहा है। दुर्भाग्यवश भाजपा, बसपा व सपा के स्थानीय विधायक और नेता भी तो खनन माफिया के साथ हैं या सीधे लूट में शामिल हैं।


इतना ही नहीं उनके पारंपरिक रोजगारों पर भी इसी माफिया का नियंत्रण है। नदी के किनारे गैर मानसूनी महीनों में खेती करना या नाव पार कराना या मछली पक़डना स्थानीय समुदाय के नैसर्गिक अधिकार हैं। पर यह सब करने के लिए भी उन्हें स्थानीय माफियाआें को टैक्स देना प़डता है। जैसे खादर में लगने वाले तरबूज के हर पौधे पर पांच रु मछली पक़डने पर हर किलो ५० रु। इतना ही नहीं नाव चलाने का ठेका भी किसी निषाद के नाम पर लेकर उसे कोई माफिया ही चलाता है और खुद लाखों कमाता है, जबकि निषाद भूखे मरते हैं। इलाहाबाद की बारह, कर्चना तहसील, कोशाम्बी की छैल व मंझनपुर तहसील और चित्रकूट की मउ तहसील के निषादों को अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान से ब़ढे डॉ आशीष मित्तल व उनके साथियों ने ‘आल इंडिया किसान मजदूर सभा’ के झंडे तले संगठित कर इस शोषण के विरुद्ध लगातार बारबार प्रदर्शन किये। जिला प्रशासन को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सन्‌ २००८ के आदेश व प्रदेश सरकार के सन्‌ २००० के आदेशों का हवाला दिया। पर कोई सुनवाई नहीं हुई। बल्कि इन सबके विरुद्ध पुलिस और गुंडों का आतंक ब़ढता गया। बारबार संघर्ष हुए। जिनमें मजदूर घायल हुए और मारे भी गये, पर पुलिस और प्रशासन का रवैया खनन माफियाआें की तरफदारी वाला रहा और माफिया द्वारा सताये जा रहे निषादों के खिलाफ दर्जनों फर्जी मुकदमें कायम कर दिये गये। बावजूद इसके इन जुझारू निषादों का मनोबल नहीं टूटा और यह आज भी अपने हक के लिए ल़ड रहे हैं। क्या यह संभव है कि दलितों के लिए दबंगाई से आवाज उठाने वाली सुश्री मायावती, जोकि प्रदेश की पहली बहुमत वाली दलित सरकार की नेता हैं, तो इस दमन चक्र का पता ही न हो।-स्वतंत्र वार्ता